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आखिर क्यूँ भारत को 14/15 अगस्त की रात को ही स्वतंत्रता मिली?

रात तक कांग्रेस और सिख समुदाय के नुमाईंदों ने इस योजना को पूरी तरह स्वीकार कर लिया जबकि मुस्लिम लीग के मोहम्मद अली जिन्ना अभी भी संशय में थे. हालांकि उन्हें उनका पाकिस्तान मिल रहा था और उनकी चाहत पूरी हो रही थी लेकिन फिर भी वह कुछ अन्य मांगों को और मनवाना चाह रहे थे

15 अगस्त यानी भारत का स्वतंत्रता दिवस लेकिन क्या आप जानते हैं कि 15 अगस्त को ही स्वतंत्रता दिवस के दिन के रूप में क्यों चुना गया ? तो चलिए यह जानने के चलते हैं 74 साल पहले ! उस दिन जब ब्रिटेन के तत्कालीन पूर्व प्रधानमंत्री विस्टन चर्चिल को जब लुई माउन्टबेटन ने ये जानकारी दी कि भारत और पाकिस्तान कॉमनवेल्थ यानी उसके बनाये गए समूह में शामिल होने के लिए तैयार हो गया हैं तो चर्चिल ने तुरंत से हॉउस ऑफ लॉर्ड्स यानी ब्रिटेन की राज्यसभा से भारत को स्वतंत्र करने और विभाजन के आर्डिनेंस को अनुमति दे दी थी. ज़ाहिर हैं अप्रत्यक्ष रूप से कहीं न कहीं वह इसके द्वारा अपने गुलाम रह चुके देशों से अभी भी संपर्क बनाए रखना चाहता था और कॉमनवेल्थ ही वह मात्र एक तरीका था.

भारत के तत्कालीन वायसराय लुई माउंटबेटन जल्दबाजी में सारे डॉक्यूमेंट को इकट्ठा कर भारत की राजधानी दिल्ली लौट आए और सभी भारतीय दिग्गज नेताओं को ल बिठाकर फाइनल मसौदे के प्रस्ताव की स्वीकृति के लिए मनाने लगे. उस दौरान सिख, मुस्लिम और हिन्दू समुदाय का नेतृत्व कर रहे राजनेताओं के बीच में माउंटबेटन देश के विभाजन के तरीके को बारीकी से समझा रहे थे और इस प्रस्ताव पर सभी की रज़ामंदी में ही बेहतरी का सपने से अवगत करा रहे थे. मतलब ले देकर यही एक आखरी रास्ता था जिससे भारत में एक सकारात्मक भविष्य की उम्मीद की जा सकती थी

वायसराय ने आखिर में गोल मेज से उठने के दौरान कहा,
“कल सुबह मैं आप लोगों से दुबारा मिलना चाहूंगा…
उससे पहले आधी रात तक अगर आप तीनों मुझे विश्वास दिला दें कि योजना को स्वीकार कर लेने की तैयारी आप तीनों ने कर ली है तो अंतिम समझौते का आधार प्रस्तुत हो जाएगा. फिर मेरा निजी सुझाव भी यही है कि हम सब अपनी रजामंदी को ऑल इंडिया रेडियो के जरिए सार्वजनिक कर देंगे. और वहीं उधर लंदन रेडियो से क्लीमेंट एटली भी हमारी रजामंदी का अनुमोदन प्रसारित कर देंगे, और एटली उस दौरान ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे.

रात तक कांग्रेस और सिख समुदाय के नुमाईंदों ने इस योजना को पूरी तरह स्वीकार कर लिया जबकि मुस्लिम लीग के मोहम्मद अली जिन्ना अभी भी संशय में थे. हालांकि उन्हें उनका पाकिस्तान मिल रहा था और उनकी चाहत पूरी हो रही थी लेकिन फिर भी वह कुछ अन्य मांगों को और मनवाना चाह रहे थे, लेकिन वायसराय माउंटबेटन ने बड़ी ही चतुराई के साथ समझा बुझाकर आखिर में उन्हें रजामंद कर ही लिया.

3 जून 1947 की वो शाम, लगभग रात 7 बजे के बाद सभी नेताओं ने दिल्ली से अपने वक्तव्य जारी करके कहा कि भारतीय भू-खंड को दो अलग-अलग आज़ाद देशों में विभाजित करने के आपसी समझौते पर अमल किया गया है, माने अखंड भारत अब खंडित होने जा रहा था. सबसे पहले लार्ड माउन्टबेटन बोले जिन्होंने बड़े ही आत्मविश्वास के साथ अपनी बात सबके समक्ष रखी. इसके उपरांत जवाहरलाल नेहरू बोले उनके लहज़े में कंपन थी और बार बार उस हिंदी वक्तव्य में आपसी सौहार्द बनाये रखने की बात कह रहे थे. सबसे अंत में जिन्ना बोले जो अपने नए देश को लेकर बहुत खुश थे, वहीं उन्होंने अपनी बात उर्दू में न बोलकर इंग्लिश में बोला जिसका उर्दू में ट्रांसलेट कर बाद में सुनाया गया.

अब इसके अगले ही दिन यानी 4 जून 1947 की शाम में महात्मा गांधी कांग्रेस से अलग होने और बंटवारे की आलोचना को लेकर प्रार्थना सभा में भाषण देने वाले थे, क्योंकि बंटवारे को लेकर वो सदमे में आ गए थे और यही वजह था कि वह कांग्रेस पार्टी से बहुत नाराज़ थे. माउन्टबेटन को जब इसका पता चला की गांधी जी नाराज हैं, तो वह तुरंत गांधी जी के पास गए और उनके दुःख को सांत्वना देते हुए बड़ी ही बेबाक से अपनी बात रखते हुआ बोले कि -“यह योजना जनता द्वारा चुने नुमाईंदों द्वारा ही तो बनाई गयी है ऐसे में आप जनता की रज़ामंदी के विरुद्ध जा रहे हैं, आपने तो सर्वदा यही चाहा है न कि जनता अपने निर्णयों का फैसला खुद ले, तो अब ठीक वैसा ही हो रहा है, ऐसे में आप विरोध कर बात को और बढ़ा रहे हैं. ये सुन गांधी जी कुछ समझ नहीं पाए और अंत मे माउन्टबेटन उन्हें अपनी बात समझाने में या यूं कहें उन्हे अपने वशीकरण अभियान में बांधने में कामयाब रहें. गांधी जी मूक रहे, वह अब सोचने समझने की स्थिति में ज़रा भी नहीं थे कांग्रेस भी अब उनके सिद्धांतों और नियमों को दरकिनार कर चल रही थी. गांधी जी की विवशता को समझने वाला उस समय कोई नहीं था,

सन 1947 के मई महीने में वायसराय माउन्टबेटन ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस रखी जिसमें दुनिया भर के अलग-अलग देशों से 300 से भी ऊपर पत्रकार दाख़िल हुए थे. माउन्टबेटन के भाषण के बाद सवालों की कतार लग चुकी थीं।हरेक प्रश्न का जवाब माउन्टबेटन बख़ूबी रहे थे। और इसी बीच उनके सामने एक ऐसा सवाल आ धमका जिसके जवाब के लिए उन्हें कुछ समय लेना पड़ा।
सवाल था, भारत को उसकी प्रशासनिक शक्तियां कब तक सौंपी जा सकती हैं.

वायसराय के दिमाग में अनेक तारीखें इधर उधर दौड़ने लगीं
वायसराय कुछ सोच में पड़ गए। वह केवल इतना जानते थे कि जो कुछ होना है जल्द से जल्द होना है लेकिन इसकी कोई तारीख सुनिश्चित नहीं की गई थी. सनाटे से कक्ष में वहां बैठे सैकड़ों लोगों की आंखें माउन्टबेटन को देख रही थी…
कौन सी तारीख बताई जाए पत्रकारों को, अगस्त के आपपास या सितम्बर के आसपास.
माउन्टबेटन इसी उधेड़बुन में थे. तभी वायसराय को जापान के आत्मसमर्पण की दूसरी वर्षगांठ याद आयी. 15 अगस्त…..इस तारीख को अगर एक नए लोकतांत्रिक एशिया का जन्म दिवस बना दिया जाए तो उससे बेहतर क्या….
अचानक माउन्टबेटन ने कक्ष में मौजूद अधीर कानों को वह तारीख बताई जिसका बेसब्री से वे इंतज़ार कर रहे थे…15 अगस्त 1947.
भारतीय हाथों में सत्ता का अंतिम तबादला 15 अगस्त 1947 के दिन किया जायेगा.

जैसे ही रेडियो में इस तारीख का प्रसारण हुआ। तमाम ज्योतिषी और स्वामी मुखर हो चले। सभी के मुंह से बस एक ही स्वर फूटा- 15 अगस्त बेहद अशुभ दिन है.
कलकत्ता में, स्वामी मदनानंद के मुताबिक 15 अगस्त का दिन मकर और शनि की दृष्टि में था. ऐसे में उसने माउंटबेटन को लिखा 15 अगस्त का दिन अभिशप्त है अगर देश को 15 अगस्त के दिन आज़ाद किया गया तो देश में सूखा अकाल और खून खराब्बा आदि उपज सकते हैं जिसका कारण यह अभिशप्त दिन बनेगा. ऐसे में वायसराय को उनके आग्रह को सुनना पड़ा. लिहाज देश के आज़ादी को 14 अगस्त की रात को सुनिश्चित किया गया और वायसराय ने राहत की सांस ली…

और इस तरह से देश आधी रात में जवाहरलाल नेहरू के सुप्रसिद्ध भाषण भाग्यवधू या कहें ट्रस्ट विद डेस्टिनी के साथ आजाद हुआ. देश को भले ही ज्योतिषी के मुताबिक आधी रात में स्वतंत्र किया गया हो. लेकिन उसके परिणामों में उपजी वीभत्सता की चिंगारी आज भी हमारा आपसी वैमनस्य का सबब है. वही सबब जिससे आज यानी 74 साल बाद भी कोई सबक नहीं लिया गया है. लेकिन इस बीच आज ही के दिन कुछ नहीं तो कम से कम आप और हमें एकत्व का संकल्प तो लेना ही चाहिये जिससे आपसी वैमनस्य की चिंगारी को सौहार्द की शीतलता से बुझाया जा सके ताकि आजाद भारत का यह 74 वां स्वतंत्रता दिवस यूं ही नीरस न जाए.

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