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राजस्थान : तो इस तरह गहलोत अपने विरोधियों पर पड़े भारी, कमलनाथ की तरह नहीं गिरने दी अपनी सरकार

विश्लेषक कहते हैं मध्य प्रदेश में कांग्रेस का संख्या बल कमज़ोर था. पर राजस्थान में स्थिति थोड़ी बेहतर है. कमलनाथ भी राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं. लेकिन गहलोत राजनीतिक सूझ-बूझ और प्रबंधन में उनसे कहीं आगे हैं.

मध्य प्रदेश और राजस्थान दोनों एक दूसरे के पड़ोसी राज्य हैं. लेकिन दोनों की सियासी समीकरणों में काफी अंतर है. मार्च में सिंधिया के इस्तीफे और कमलनाथ सरकार के गिर जाने के बावजूद से ही लोग कयास लगा रहे थे कि कांग्रेस के अंदर उठे भूकंप के झटके राजस्थान में भी महसूस करने वाले हैं. ऐसे में पिछले महीने ही सम्पन्न हुए राज्यसभा चुनाव के बाद से राजस्थान में सियासी भूचाल शुरू हो गया.

सब कुछ करीब-करीब वैसा ही जैसा 4 महीने पहले कांग्रेस शासित राज्य मध्य प्रदेश में हुआ था और आखिरकार कमलनाथ सरकार गिर गई थी. ऐसे में राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत की धड़कनों का बढ़ना लाजिमी था लेकिन गहलोत का हश्र कमलनाथ जैसा नहीं हुआ. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने विरोधियों पर भारी पड़े गए.

विश्लेषक कहते हैं मध्य प्रदेश में कांग्रेस का संख्या बल कमज़ोर था. पर राजस्थान में स्थिति थोड़ी बेहतर है. कमलनाथ भी राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हैं. लेकिन गहलोत राजनीतिक सूझ-बूझ और प्रबंधन में उनसे कहीं आगे हैं.

बता दे की पांच वर्ष के वनवास के बाद राजस्थान में जब कांग्रेस सत्ता में लौटी तभी से पार्टी के भीतर का विभाजन साफ़-साफ़ दिखने लगा था.इनमें एक धड़ा मुख्यमंत्री गहलोत का था तो दूसरे गुट की आस्था उस वक्त उप मुख्यमंत्री बनाये गए सचिन पायलट में थी.

राज्य में तीसरी बार मुख्यमंत्री बने गहलोत को अंदेशा हो गया था कि उन्हें पार्टी के एक गुट से कभी भी चुनौती मिल सकती है. क्योंकि कांग्रेस को दो सौ सदस्यों की विधानसभा में 99 सीटों पर ही सब्र करना पड़ा था. लेकिन गहलोत ने अपनी राजनीतिक सूझबूझ से विधानसभा में कांग्रेस की सदस्य संख्या 107 कर ली.इतना ही नहीं गहलोत ने निर्दलीय की हैसियत से चुनाव जीत कर आये एक दर्जन विधायकों को भी पार्टी से संबद्ध करा दिया. इनमें ज़्यादातर कांग्रेस पृष्ठभूमि के नेता थे.

दरअसल राजस्थान और मध्य प्रदेश की स्थिति में फर्क यही है कि वहा कांग्रेस के पास बहुमत कमज़ोर था. राजस्थान में बेहतर स्थिति थी. राज्य में लोग उस वक्त हैरान रह गए जब मुख्यमंत्री गहलोत ने पिछले महीने राज्यसभा चुनाव से दस दिन पहले यकायक विधायकों को इकट्ठा किया और वहीं से उन्हें बाड़ेबंदी के लिए ले जाया गया.

सत्तारूढ़ पार्टी के नेताओं का कहना था कि बीजेपी ख़रीद-फ़रोख्त का प्रयास कर रही है. लेकिन पायलट समर्थकों ने इसे व्यर्थ की कवायद बताया और गहलोत पर निशाना साधते हुए कहा गया कि वे काल्पनिक भय पैदा कर रहे हैं.इसके साथ ही बता दें कि मध्य प्रदेश में जब बीजेपी ने कमलनाथ का तख्ता पलटने का काम शुरू किया, शिवराज सिंह चौहान समेत बाकी सभी नेता साथ थे. मगर राजस्थान में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने इस पूरे घटनाक्रम में चुप्पी साधे रखी.

इसी बीच पायलट ने गहलोत और राजे के बीच मिलीभगत का आरोप भी लगाए. राजे ने लंबी चुपी के बाद शनिवार को ट्वीट किया और कहा कांग्रेस कि अंतरकलह का नुक़सान जनता को भुगतना पड़ रहा है. राजे ने कहा कि लोग परेशान हैं और कांग्रेस बीजेपी नेतृत्व पर आरोप लगाने में मशगूल हैं.जानकर कहते हैं कि पायलट समर्थकों को लगता है कि राजे उनके बीजेपी से कथित संपर्क का विरोध कर रही हैं. इसलिए पायलट ने राजे पर निशाना अनायास नहीं साधा है.

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