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कोविड 19- आखिर क्यों हो रही है भारत में रेमडेसिवियर ड्रग की कमी?

भारत में रेमडेसिवियर दवाई का नाम 'कोविफ़ॉर' नाम से उपलब्ध है जो हेटेरो फ़ार्मा कंपनी द्वारा बनाई जाती है.भारत में इसे बनाने के लिए एक और कंपनी सिप्ला को अनुमति मिली है. कंपनी के अनुसार इस दवा के एक डोज़ की क़ीमत है 5400 रुपये. लेकिन दिल्ली में ये कल तक मिल रही थी 10,500 रुपये में. रेमडेसिवियर एक एंटीवायरल मेडिसिन है जिसे अमरीका की गिलिएड कंपनी द्वारा निर्मित किया जाता है, और अमेरिका इस के पास ही इसका पेटेंट भी हैं.

 

कोरोना वायरस महामारी से आज पूरी दुनिया तबाह हो चुकी है. इस महामारी का अभी तक इलाज नहीं मिल पाया है. इस सच्चाई से पूरी दुनिया वाकिफ़ है.भारत सरकार ने इमरजेंसी और सीमित इस्तेमाल के लिए कुछ दवाओं को अनुमति दी है, और इन दवाओं में रेमडेसिवियर ड्रग दवाई भी शामिल हैं.

लेकिन भारत में रेमडेसिवियर दवाई अगर इमरजेंसी इस्तेमाल के  लिए चाहिए तो ये इतनी आसानी से नहीं मिल सकती. भारत सरकार के अस्पताल आरएमएल में ये दवा उपलब्ध नहीं है, तो बाकी अस्पतालों को तो छोड़ ही दीजिए. वहीं कई मीडिया रिपोर्ट में मुताबिक मुबंई, कर्नाटक, तमिलनाडु के अस्पतालों में इस दवाई क़िल्लत की ख़बरें आ रही हैं.

वहीं अस्पतालों के अतिरिक्त अस्पतालों के बाहर किसी भी मेडिकल स्टोर पर रेमडेसिवियर आपको मिलना मुश्किल हैं. यदि आप दवा के बड़े व्यापारियों को जानते है, तब हो सकता है कि आपको ये दवा मिल जाए है. पर उसके लिए दिल्ली, मुंबई, चेन्नई जैसे बड़ें शहरों में आपको इस दवाई को खरीदने के लिए दोगुने पैसे ख़र्च करने पड़ सकते हैं.

बता दें कि भारत में रेमडेसिवियर दवाई का नाम ‘कोविफ़ॉर’ नाम से उपलब्ध है जो हेटेरो फ़ार्मा कंपनी द्वारा बनाई जाती है.भारत में इसे बनाने के लिए एक और कंपनी सिप्ला को अनुमति मिली है. कंपनी के अनुसार इस दवा के एक डोज़ की क़ीमत है 5400 रुपये. लेकिन दिल्ली में ये कल तक मिल रही थी 10,500 रुपये में. रेमडेसिवियर एक एंटीवायरल मेडिसिन है जिसे अमरीका की गिलिएड कंपनी द्वारा निर्मित किया जाता है, और अमेरिका इस के पास ही इसका पेटेंट भी हैं.

कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए भारत में इसके इमरजेंसी में सीमित इलाज में इस्तेमाल की अनुमति मिली है.
भारत में फ़ार्मा कंपनी हेटेरो को इस दवाई को ‘कोविफ़ॉर’ नाम से बनाने की मंज़ूरी ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया की ओर से मिली है. ऐसा उनका कहना है. बता दें कि हेटेरो, जेनरिक दवाई उत्पादन की कंपनी है, जो भारत में 21 जून के बाद से रेमडेसिवियर का जेनेरिक वर्जन दवा ‘कोविफ़ॉर’ बनाकर बेच रही है.

इस बारे में हेटेरो कंपनी के पब्लिक रिलेशन विभाग के कॉरपोरेट कम्युनिकेशन हेड जय सिंह बालाकृष्णन ने बीबीसी से बताया कि रेमडेसिवियर दवा बाज़ार में दोगुनी कीमत पर मिल रही है और दवाई की सप्लाई में कमी है – इन दोनों ही प्रश्नों पर कंपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं देना चाहती” बीबीसी ने जब उनसे ये पूछा कि क्या उनकी दवा मेडिकल स्टोर पर भी उपलब्ध हो सकती है? इस सवाल के जवाब में बालाकृष्णन ने कहा कि फ़िलहाल ये दवा कंपनी सीधे सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों को मुहैया करा रही है. केन्द्र सरकार के निर्देश के अनुसार ये ड्रग रीटेल में नहीं बेची जा सकती.

 

उन्होंने ये भी कहा कि कोरोना के सीवियर कैटेगरी के मरीज़ों में ही इसका इस्तेमाल क्रिटिकल केयर सेटिंग में मेडिकल प्रैक्टिशनर की निगरानी में सिर्फ अस्पतालों में ही किया जा सकता है. 21 जून के बाद से कंपनी को इस दवा को बनाने की अनुमति मिली है. कंपनी 20,000 वायल (डोज़) जल्द से जल्द मुहैया करा रही है. जिसमे इस दवा की पहली खेप में 10,000 डोज दिल्ली को मुहैया कराया गया है, 10, 000 डोज हैदराबाद, 10,000 डोज महाराष्ट्र, 10,000 तमिलनाडु, और 10,000 डोज गुजरात को मुहैया कराया गया है. वहीं दूसरी खेप कोलकाता, लखनऊ, भोपाल, इंदोर जैसे बड़े शहरों के लिए तैयार हो रही है.

गौरतलब है कि रेमडेसिवियर दवा अमरीकी कंपनी गिविएड बनाती है और उसी के पास इसका पेटेंट भी उपलब्ध है. हेटेरो कंपनी का ऐसा दावा है कि कंपनी ने गिलिएड के साथ समझौता किया है और इसलिए उन्हें भारत के लिए इसे बनाने की अनुमति दी गई है. लेकिन भारत सरकार के ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया ने बंग्लादेश से इसके आयात पर प्रतिबंध लगा रखी है. दवा कंपनियों के अनुसार गिलिएड ने बांग्लादेश से इस बारे में कोई आधिकारिक समझौता नहीं किया है. इसलिए भारत सरकार कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती.

इस मामले में बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगले तीन महीने तक गिलिएड कंपनी जितनी भी रेमेडेसिवियर दवा बनाए गी, उससे अमरीका ने पहले ही ख़रीद लिया है. मंगलवार को इसका इलान करते हुए अमरीकी स्वास्थ्य विभाग ने कहा कि इस दवा के पाँच लाख डोज़ अमरीकी अस्पताल के लिए ख़रीदने का निर्णय किया गया है. हालांकि कोरोना वायरस की ये दवा तो नहीं है, लेकिन शोध में पाया गया है कि इसके इस्तेमाल से मरीज़ों में रिकवरी में कम समय लगता है. बता दें कि अमरीका के अतिरिक्त बाहर दुनिया में केवल नौ कंपनियों के पास ही इसे बनाने और बेचने का अधिकार है. ये सबसे बड़ा कारण है, इस ड्रग की सप्लाई में आई कमी की.

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