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मध्य प्रदेश : मंत्रिमंडल विस्तार के लिए सिंधिया- चौहान में खींचतान जारी, जाने आखिर क्या है वजह !

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पिछले सालों में मंत्री रहे उनके ख़ास लोगों को बाहर नहीं रखना चाहते हैं. वो चाहते हैं कि इस पर फैसला बाद में लिया जाए. 

मध्य प्रदेश में लगभग 15 माह बाद मार्च में सत्ता में लौटी भारतीय जनता पार्टी को दूसरे मंत्रिमंडल विस्तार में अंदरुनी खींचतान का सामना करना पड़ रहा है. बता दें कि मध्यप्रदेश में मंत्रिमंडल विस्तार गुरुवार को होने जा रहा है. भाजपा और सिंधिया समर्थकों को इस विस्तार का इंतेज़ार लंबे समय से था. मंत्रिमंडल विस्तार की बातें पिछले महीने से लगातार हो रही हैं और अभी तक किसी अंजाम पर नहीं पहुंच पाई हैं.

दरअसल मंत्रिमंडल के विस्तार को लेकर पिछले पांच छह दिनों से कवायद चल रही है और मुख्यमंत्री चौहान स्वयं भी दिल्ली में सभी वरिष्ठ भाजपा नेताओं से मिलकर आए हैं. मंत्रिमंडल विस्तार में जहां कुछ समय पहले भाजपा में आए ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों का ध्यान रखा जा रहा है, वहीं माना जा रहा है कि इस बार नए चेहरों को भी काफी तवज्जो मिलेगी.

यह बात भी उठ रही है कि दो मंत्रियों को उपमुख्यमंत्री बनाया जाए. इनमें एक नाम गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का है तो दूसरा नाम तुलसी सिलावट का. तुलसी सिलावट, सिंधिया समर्थक हैं. वही मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान के एक बयान के कई मतलब निकाले जा रहे है. उन्होंने कहा, “समुद्र मंथन से निकले जहर को शिव ही पीते हैं.” यह मंत्रिमंडल सरकार बनने के लगभग 100 दिन से ज़्यादा के बाद होने जा रहा है. अभी तक शिवराज मंत्रिमंडल में मात्र पांच मंत्री है.

खींचतान की वजह ये भी बताई जा रही है कि कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामने वाले ज़्यादातर पूर्व विधायक शिवराज सिंह चौहान के सत्ता में आने के 100 दिन बाद भी मंत्री नहीं बन पाए हैं.

पार्टी के अंदर जिस तरह के समीकरण बन रहे हैं उससे यह महसूस होता है कि एक तरफ सिंधिया जहां अपने ज़्यादा से ज़्यादा मंत्रियों को शपथ दिलाना चाहते हैं वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिये अपने करीबियों को मंत्रिमंडल में लाने के लिये ऐड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ रहा है.

पार्टी संगठन की कोशिश है कि इस मंत्रिमंडल विस्तार में नये चेहरों को मौक दिया जायें. लेकिन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पिछले सालों में मंत्री रहे उनके ख़ास लोगों को बाहर नहीं रखना चाहते हैं. वो चाहते हैं कि इस पर फैसला बाद में लिया जाए.

वहीं सिंधिया अपने 12 लोगों को मंत्री देखना चाहते हैं. इनमें 6 वह लोग है जो पिछली कमलनाथ सरकार में भी मंत्री रहे हैं. लेकिन भाजपा नेतृत्व चाह रहा है कि इनमें से कुछ को कम कर दिया जाए और उपचुनाव में जीतने के बाद मंत्री बनाया जाए.

ऐसी स्थिति में गोपाल भार्गव, विजय शाह, सुरेंद्र पटवा, रामपाल सिंह, राजेंद्र शुक्ला, जगदीश देवड़ा, पारस जैन, नागेंद्र सिंह, करण सिंह वर्मा, गौरीशंकर बिसेन, अजय विश्नोई, भूपेंद्र सिंह जैसे नेताओं को बाहर बैठना पड़ सकता है.

मालूम हो कि कांग्रेस की कमलनाथ सरकार ने भी अपने कई वरिष्ठ नेताओं को मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी थी जिससे पार्टी के अंदर ही असंतोष उभरा. इसे सरकार गिरने की एक वजह माना जा सकता है.

मध्यप्रदेश में मंत्रिमंडल में इस वक्त सिर्फ पांच ही मंत्री हैं. इन्हें भी मुख्यमंत्री ने सत्ता संभालने के 29 दिन बाद 21 अप्रैल को बनाया था. ये पांच मंत्री नरोत्तम मिश्रा, गोविंद सिंह राजपूत, मीना सिंह, तुलसीराम सिलावट और कमल पटेल है. इनमें तुलसी सिलावट और गोविंद सिंह राजपूत, सिंधिया ग्रुप से हैं.

मध्यप्रदेश में 24 सीटों पर उपचुनाव होने हैं इसलिये इस तरह का असंतोष पार्टी के लिये मुश्किल पैदा कर सकता है. 24 सीटों के परिणाम ही इस सरकार का भविष्य तय करेंगे.

22 सीटें वो हैं जिनपर कांग्रेस विधायक इस्तीफा देकर भाजपा में आये हैं. 2 सीटें विधायकों के देहांत हो जाने की वजह से खाली हुई हैं. 230 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा के 107 विधायक हैं जबकि काग्रेंस के पास 92 विधायक हैं. 7 विधायक निर्दलीय और अन्य पार्टियों के हैं जो पहले कांग्रेस के साथ थे तो अब भाजपा के साथ हैं.

इस बीच जो स्थिति बन रही है वह ये है कि कमलनाथ सरकार गिरा कर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सत्ता तो पा ली है लेकिन अब आगे का सफर तय करने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है.

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