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रानी लक्ष्मी बाई: जिनके बारे में दुश्मन ने कहा, ‘वो इकलौती मर्द थी’

रानी जिसने कहा था 'मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी.'

संयोग देखिए आज International Mens Day है. और आज ही जन्मदिन है भारतीय इतिहास की महानतम वीरांगनाओं में से एक झांसी की रानी लक्ष्मी बाई (Rani lakshmibai) का जिनके बारे में ब्रिटिश सैन्य अधिकारी ह्यूरोज ने कहा था.

‘भारतीय क्रान्तिकारियों में वह अकेली मर्द है.’

बनारस में एक मराठी ब्राह्मण परिवार में पैदा हुई मणिकर्णिका यानि मनु के पिता का नाम मोरोपंत तांबे था. मोरोपंत तांबे बिठूर रियासत के पेशवा के यहां काम करते थे. मनु जब 4 साल की थी तभी मां भगीरथ बाई चल बसीं. मनु का ज्यादातर समय पिता के साथ ही बीता.

मनु ने बचपन में ही घुड़सवारी, तलवारबाजी, तीरंदाजी सहित जंग की सभी कलाओं में महारत हासिल कर ली. झांसी नरेश गंगाधर राव नेवलकर के साथ 1842 में विवाह के बाद मनु रानी लक्ष्मी बाई बन गईं.

ये वो दौर था जब अंग्रेज भारत में अपने पैर तेजी से पसारते जा रहे थे. यही वो भी समय था जब रानी के जीवन में दुर्भाग्य ने दस्तक दी. 1851 में रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम दामोदर राव रखा गया. लेकिन दामोदर राव सिर्फ चार महीने ही जीवित रहे और चल बसे. इस घटना ने गंगाधर राव को तोड़ कर रख दिया. गिरती सेहत के बीच महाराज ने एक दत्तक पुत्र गोद लिया. रानी उसका संरक्षक बनकर गद्दी पर बैठी.

इसी समय लार्ड डलहौजी की राज्य हड़प नीति अपनी चरम पर थी. डलहौजी ने रानी के दत्तक पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया. और अपने कैप्टन अलैक्जेंडर स्कीन को झांसी की जिम्मेदारी सौंप दी.

इसी बीच 1857 का विद्रोह (Revolt of 1857) भी भड़क गया. रानी ने विद्रोह में हिस्सा लिया.

रानी से खफा अंग्रेजों ने हैमिल्टन के नेतृत्व में 6 जनवरी 1858 को झांसी पर कब्जा करने के लिए फौज भेज दी.

रानी ने अपनी प्रजा के सामने गर्जना की
‘मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी.’

अंग्रजों के साथ रानी की भयंकर लड़ाई हुई. इस लड़ाई में रानी के साथ न सिर्फ पुरुषों ने बल्कि महिलाओं ने भी बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया. औरतें तोप चलते और गोला बारूद बांटते देखी गईं.

रानी ने अपने साथियों को शपथ दिलाई
‘हम अपने हाथों अपनी आजदशाही (स्वतंत्रता) की कब्र नहीं खोदेंगे.’

रानी अपने पूरे दमखम से लड़ी. लेकिन खुद को कमजोर होता हुआ देखकर रानी ने अपने पुत्र दामोदर राव को पीठ पर बांधा और कुछ सैनिकों के साथ झांसी से बाहर निकल गईं.

अपने एक लेख ‘लक्ष्मीबाई : रानी ऑफ झांसी’ में अमेरिकी लेखिका पामेला डी टॉलर लिखती हैं कि

‘अगले 24 घंटे में तकरीबन 93 मील की दूरी तय करने के बाद रानी लक्ष्मी बाई काल्पी पहुंचीं जहां उनकी मुलाकात ब्रिटिश सरकार की आंखों की पहले से किरकिरी बने हुए नाना साहेब पेशवा, राव साहब और तात्या टोपे से हुई. 30 मई को ये सभी बागी ग्वालियर पहुंचे जहां का राजा जयाजीराव सिंधिया अंग्रेजों के समर्थन में था लेकिन उसकी फौज बागियों के साथ हो गई.’

बहादुर रानी सिपाही के वेश में घोड़े पर बैठकर लड़ते हुए 17 जून 1858 को वीरगति को प्राप्त हुईं.

अंग्रेज अफसर कॉर्नेट कॉम्ब ने रानी की बहादुरी की तारीफ करते हुए लिखा कि, ‘वो बहुत ही अद्भुत और बहादुर महिला थी. यह हमारी खुशकिस्मती थी कि उसके पास उसी के जैसे आदमी नहीं थे.’

रानी लक्ष्मी बाई का जीवन सदियों तक इस बात की प्रेरणा देता रहेगा कि संघर्ष कैसे किया जाता है.

रानी लक्ष्मी बाई की बात हो और सुभद्रा कुमारी चौहान की इस कविता का जिक्र न किया जाए तो कोई भी कहानी मुकम्मल नहीं हो सकती.

सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,
बूढ़े भारत में आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी.
चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी.

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