BANNER NEWSBREAKING NEWSटेक

मोबाइल रखते हैं तो ये जानना बेहद जरूरी है

हमारा स्मार्टफोन संचार के माध्यम के साथ साथ एक "साइलेंट किलर" का भी काम कर रहा है.

क्या आपने कभी आंकलन किया है किआप कितने शिक्षित या कितने जागरूक हैं?

शिक्षा व जागरूकता ये दो शब्द एक दुसरे से परे हैं. क्योकि ऐसा जरुरी नहीं कि आप अगर शिक्षित हो तो आप जागरूक भी हों. क्योकि जागरूकता को सामान्य शब्दों में कहें तो अपने आस-पास के होने वाले घटनाक्रम का भली-भांति मंथन करना और स्वयं के विवेक से सकारात्मक व नकारात्मक पहलुओं को समझना व अन्य को भी समझाना है.

किन्तु हम शिक्षित लोग अपनी दैनिक जीवन शैली में इतने सीमित हैं कि अपने आस-पास के घटनाक्रम को आसानी से नजरअंदाज कर देते हैं. फिर चाहे वह अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए घातक ही क्यों न हो.

कभी-कभी सोचती हूं कि हम किस तरह क लोग हैं जो वर्तमान के मोह-पाश में हैं, किन्तु भविष्य की कोई चाह नही हैं, हम हमारी सरकार से रोजगार, शिक्षा इत्यादि की मांग करते है किन्तु कभी आपने इस बारे में सोचा है कि अगर हमारी आने वाली नस्लें मानसिक रूप से अल्प विकसित होगी तो हम चांद पर जाकर क्या करेंगे ?

बात सुनने में असहज है क्योकि हम कभी सोचते नही. किन्तु ये सच है. आने वाले दशक बाद शायद हमारी आने वाली पीढ़ी उतनी स्वस्थ न हो जितने हम हैं, कारण हम सब के हाथ में है.

जी हमारे हाथ में सदैव रहने वाला वो एक छोटा सा ‘टिन का डब्बा’ जिसने हमे पूरी तरह जकड़ रखा है. मैं (Mobile/Cellphone)की बात कर रही हूं, जो एक नवजात से लेकर वृद्ध तक को लोभित करता है.

2017 से दिल्ली एनसीआर के 4500 लोगों पर Department of Telecommunication (DOT) द्वारा शोध किया जा रहा है. अध्ययन के शुरुआती नतीजे बताते हैं कि मोबाइल फोन के ज्यादा इस्तेमाल से सुनने, प्रजनन क्षमता और ध्यान में कमी के साथ हाईपर एक्टिविटी जैसी समस्या हो सकती है.

हमारे स्मार्टफोन से निकलने वाला रेडिएशन एक ऐसी चीज है जिसके बारे में लोगों को सबसे कम जानकारी होती है. रेडिएशन या SAR (Specific absorption rate) value, samrt phone से ट्रांसमिट होने वाली एक Radio Frequency होती है जो कुछ मात्रा में रेडिएशन पैदा करती है. ज्यादा वक्त तक लगातार रेडिएशन के असर में रहना स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है. Department of Telecommunication (DOT) ने इसकी लिमिट 1.6 w/kg तय कर रखी है. स्मार्ट फोन बेचने वाली कंपनियां SAR रेटिंग को डिवाइस के बॉक्स में आने वाले मेनुअल बॉक्स में या बॉक्स के ऊपर मेंशन करती है.

आइये पहले समझते हैं कि स्मार्ट फ़ोन काम कैसे करते हैं. हमारे मोबाइल में एक एन्टीना होता है जो दो काम करता है. एक मोबाइल फ़ोन के Signal को मोबाइल Tower तक भेजता है. और दूसरा मोबाइल टावर से अपने मोबाइल फ़ोन में रिसीव करता है. एन्टीना इन्हें सिग्नल Electromagnetic waves क रूप में ट्रांसमिट करता है. और इस waves की मदद से हमारा Communication system चलता है.

जब हम कहीं फ़ोन करते है तो ये waves टावर के पास जाती हैं और वापस जब आती हैं तो वातावरण में फैलने क कारण कुछ waves loss हो जाती हैं. मान लीजिये 100 waves भेजी तो टावर तक केवल 70 waves पहुंची तब शेष 30 waves आस-पास के वातावरण में रेडिएट हो गयी. जब फ़ोन का एन्टीना पूरे पॉवर के साथ काम करता है तो फोन का वोल्टेज ज्यादा हो जाता है जो हमारे लिए नुकसानदायक है इसलिए अगर आप कही भी फोन करें तो याद रखे आपके फ़ोन का डाटा बंद हो जिससे कम waves उत्सर्जित हों.

अब जानते है फोन में कितना SAR होना चाहिए. SAR value को 2 भागो में बांटा गया है, पहला सिर(head)और दूसरा शरीर (body). जब आप किसी से फ़ोन पर बात करते है तो आपका सिर नजदीक होता है इसके लिये अलग SAR value specified की गई है. औऱ जब आप फोन जेब या हाथ में रखते हैं तो इसके लिए अलग SAR value specified की गई है. भारत मे 1.6 watt/kg SAR value तय की गई है.
हमारे स्मार्टफोन की SAR value को हम आसानी से पता कर सकते हैं. इसके लिए आपको अपने मोबाइल मैं *#07# dial करना होगा तब आपकी मोबाइल स्क्रीन पर head SAR value व body SAR value आ जायेगी.

जिस मोबाइल की जितनी कम SAR value होगी उस से उतना कम खतरा होता है. Xiomi MI A1 की SAR value सबसे ज़्यादा 1.75watt/kg है. उसके बाद one plus st की 1.68 watt/kg है. जबकि सबसे कम samsung galaxy note 8 की है जो 0.17 watt/kg है.

अतः अगली बार मोबाइल ख़रीदते वक़्त आप उसकी SAR value अवश्य चेक करें.

किन्तु इसके अलावा भी कुछ छोटी-छोटी चीजे है जो हमें मोबाइल रेडिएशन से बचा सकती हैं. जैसे:-

1. रात को सिर के पास मोबाइल रखकर ना सोयें.

2. देर रात लगातार एक कान की तरफ़ से बात ना करें

3.चार्जिंग के दौरान नेट या कालिंग ना करें. इस दौरान रेडिएशन लेवल 10 गुना बढ़ जाता है.

4.  हेड फ़ोन का इस्तेमाल करें.

हमारा स्मार्टफोन संचार के माध्यम के साथ साथ एक “साइलेंट किलर” का भी कम कर रहा है. इससे सड़क हादसो में भी इजाफा हुआ है. स्क्रीन को लगातार देखने से आंखों में जलन , रंगों की पहचान की शक्ति भी समाप्त हो रही है.
इस तरह के अन्य गैजेट्स नपुंसकता, ट्यूमर, चिड़चिड़ापन,तनाव, गुस्सा इत्यादि को बढ़ावा दे रहे हैं. अतः आप से आग्रह है इनका उपयोग सीमित करे व स्वस्थ रहें.

 

(नीतू कुशवाह )

हमारे लिए ये लेख नीतू कुशवाह जी ने लिखा है. नीतू जी इंदौर की रहने वाली हैं. पेशे से शिक्षक हैं, केमेस्ट्री पढ़ाती हैं.

Tags
Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *