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गमछा रखते हो! बाहर रहो एंट्री नहीं मिलेगी

दरअसल ये एक तुच्छ मानसिकता है जो पूर्वाग्रह पर आधारित है. किसी एक क्षेत्र विशेष से आने वाले लोगों को उनकी बोली या पहनावे के आधार पर हीन और कमतर समझने की भावना. यूपी, बिहार और झारखंड से आने वाले लोग दिल्ली जैसे बड़े शहरों में, खासकर लुटियंस दिल्ली जोन में, अक्सर इस छोटी सोच का सामना करते हैं.

नीलोत्पल मृणाल. हिंदी के लेखक हैं. झारखंड से आते हैं. साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता हैं. सौ टका शुद्ध देसी आदमी हैं. लोक मानस से गहरा लगाव रखते हैं. और इस स्टोरी की सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि गले में गमछा डाल के रखते हैं.

अब आप सोच रहें होंगे कि हम आपको ये सब क्यों बता रहे हैं. दरअसल मामला ये है कि नीलोत्पल बीते दिनों दिल्ली के पॉश एरिया कहे जाने वाले कनॉट प्लेस के एक होटल में खाना खाने पहुंचे थे. वहां उनको अंदर जाने से सिर्फ इसलिए रोका गया क्योंकि उन्होंने गले में गमछा डाल रखा था. अब आपको समझ में आया होगा कि हमने उपर क्यों कहा कि इस स्टोरी की सबसे महत्वपूर्ण बात गले में गमछा डालना ही है.

अपने साथ हुई इस घटना का जिक्र नीलोत्पल ने अपनी फेसबुक वॉल पर किया है. इस घटना का जिक्र करते हुए नीलोत्पल लिखते हैं..

भौंचक्क हूं!
एक कार्यक्रम से लौट रहा था. भूख लगी तो सोचा कि कुछ खाता चलूं. अभी अभी कनॉट प्लेस के एक होटल Q,BA में गया था. मैं अंदर घुस ही रहा था कि होटल का मैनेजर लगभग दौड़ते हुए आया और हाथ देकर रोकता हुआ बोला “आप गले में ये ले के नहीं जा सकते. ये गमछा आपको बाहर रखना होगा.” मेरा सर घूम गया था. जीवन में पहली बार ये अनुभव हुआ. इसके बाद मैनें इस मैनेजर का क्या किया ये बताना महत्वपुर्ण नहीं. महत्वपुर्ण ये है कि आप सुनें,सुनें कृपया “मुझे गले में गमछा रखने के कारण रेस्टोरेंट में नहीं घुसने दिया जा रहा था.”

(नीलोत्पल मृणाल)

अब आप सोचिए जरा अगर आपको आपकी पारंपरिक वेश भूसा के कारण किसी सार्वजनिक जगह पर जाने से रोक दिया जाए. वो भी तब जब कोई ड्रेस कोड भी न लागू हो तो कैसा लगेगा.

दरअसल ये एक तुच्छ मानसिकता है जो पूर्वाग्रह पर आधारित है. किसी एक क्षेत्र विशेष से आने वाले लोगों को उनकी बोली या पहनावे के आधार पर हीन और कमतर समझने की भावना. यूपी, बिहार और झारखंड से आने वाले लोग दिल्ली जैसे बड़े शहरों में, खासकर लुटियंस दिल्ली जोन में, अक्सर इस छोटी सोच का सामना करते हैं.

यहां बात सिर्फ किसी एक व्यक्ति के साथ हुए गलत व्यवहार की नहीं है. एक होटल के मैनेजर ने आखिर ऐसी हरकत की ही क्यों? बाजारवाद का जमाना है. बाजार काफी हद तक लोगों की मानसिकता के अनुसार ही चलते हैं. अब अगर होटल दिल्ली के कनॉट प्लेस में है तो जाहिर सी बात है कि वहां अच्छे खासे घरों के लोग ही जाते होंगे. ये लोग पढ़े लिखे भी होंगे. अब सवाल ये उठता है कि ये तथाकथित पढ़े लिखे एलीट क्लास लोगों की कौन सी प्रजाति है जिसे गले में गमछा पहनने वाले लोगों के साथ बैठना पसन्द नहीं है! क्या ये किसी और दुनिया के लोग हैं जिन्हें बाकी सब खुद से छोटे और कमतर दिखते हैं?

दिल्ली जैसे शहरों में यूपी, बिहार और झारखंड जैसी जगहों से आने वाले लोगों को क्षेत्रीयता, क्षेत्रीय बोली या क्षेत्रीय पहनावे के आधार पर भेदभाव का सामना कभी न कभी करना ही पड़ता है. आप किसी अच्छी कंपनी के ऑफिस चले जाइए. वहां देखिए कि कैसे बाकी जगहों से आए हुए दो लोग अपनी क्षेत्रीय बोली में आराम से बात कर लेंगे. लेकिन भोजपुरी, मैथिल, या किसी और लोकल बोली में बात करने वाले लोग आपस में भी बात करने से संकोच करते हैं. कारण. आपके मुंह से भोजपुरी या मैथिल के दो शब्द निकले नहीं कि निगाहें आपको ऐसे देखेंगी जैसे आप इंसान नहीं एलियन हों.

ये समझना बहुत जरुरी है कि किसी बड़े पांच सितारा होटल के एयर कंडीशंड लॉन में सभ्यता या संस्कृति पर सेमिनार आयोजित करने से समानता नहीं आएगी. सबसे ज्यादा जरूरी है पूर्वाग्रह से दूर हटकर सबका सम्मान करना.

बाकी गमछा हमारी पहचान है. हमें पसंद है. गमछा ही हमारा फैशन है. गमछा ही हमारा स्वैग है. हम इसे गले में डालकर जब चाहे, जहां चाहे जाएंगे. किसी को पसंद आए तो भी ठीक. न आए तो भी ठीक.

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