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क्या कुर्सी के लिए ‘चरित्र’ बदलेगी शिवसेना!

56 सीटों वाली शिवसेना को बहुमत का आंकड़ा पाने के लिए 88 विधायकों की जरूरत है. इसके लिए शिवसेना को एनसीपी और कांग्रेस के समर्थन की जरूरत है.

 

सियासत भी अजीब बला है. बीते 24 अक्टूबर को जब महाराष्ट्र के चुनावी नतीजे आए तब किसने सोचा था कि चंद दिनों बाद ही राज्य एक सियासी भंवर में फंस जाएगा. तमाम विरोधाभासों के बावजूद विधान सभा चुनाव में एक दूसरे का हाथ पकड़ कर चल रही शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी के रिश्ते अब टूट गए हैं.

ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद की मांग कर रही शिवसेना अपनी जिद पर अड़ी है. वहीं भाजपा ने भी साफ कर दिया है कि भईया चाहे कुछ भी हो जाए मुख्यमंत्री तो भाजपा का ही रहेगा. वो भी पूरे पांच साल के लिए.

इस सियासी उठापटक का नतीजा ये हुआ है कि विधान सभा चुनावों में 105 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी भाजपा ने सरकार बनाने से इनकार कर दिया है. गेंद अब शिवसेना के पाले में है और सरकार बनाने का न्योता भी उसी को मिला है.

56 सीटों वाली शिवसेना को बहुमत का आंकड़ा पाने के लिए 88 विधायकों की जरूरत है. इसके लिए शिवसेना को एनसीपी और कांग्रेस के समर्थन की जरूरत है.

इन सबके बीच एक बड़ा सवाल ये उठता है कि अगर शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने महाराष्ट्र में मिलकर सरकार बना भी ली तो इस गठबंधन का सियासी भविष्य क्या होगा. भ्रष्टाचार और अतिवाद के मुद्दे पर एक दूसरे को पानी पी पी कर कोसने वाली राजनीतिक पार्टियां एक दूसरे का हाथ पकड़कर कितने दिनों तक साथ चल पाएंगी!

विचारधारा में विरोधाभास

जहां तक राजनीतिक विचारधारा की बात है शिवसेना की छवि ‘कट्टर हिंदुत्ववादी’ पार्टी की रही है. वहीं कांग्रेस और एनसीपी ने ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर राजनीति की है. राम मंदिर आंदोलन का दामन पकड़कर ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ की छवि बनाने वाले शिवसेना संस्थापक बाला साहेब ठाकरे हों या उनके बाद पार्टी की कमान संभालने वाले उद्धव ठाकरे, दोनों ने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के मुद्दे को ही अपनी पार्टी का एजेंडा बनाया है. वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने इन दोनों मुद्दों पर हमेशा ही घोर विरोध जताया है. अब बदली हुई परिस्थितियों में कांग्रेस किंग मेकर की भूमिका में है. सत्ता की चाबी पूरी तरह से कांग्रेस के ही हांथों में है.

हालांकि राजनीति में ये पहली बार नहीं है कि किन्ही दो विरोधाभासी विचारधारा वाली पार्टियों का गठबंधन होगा. इससे पहले भी हम जम्मू कश्मीर में भाजपा और पीडीपी का गठबंधन देख चुके हैं. लेकिन उस गठबंधन का हश्र क्या हुआ ये भी सबको पता है.

पीछे हटना भाजपा की सोची समझी नीति है!

ऐसा माना जा रहा है कि भाजपा का सरकार बनाने से कदम पीछे खींचना अनायास ही नहीं है. ये सोची समझी रणनीति का हिस्सा है. अगर शिवसेना कांग्रेस और एनसीपी के साथ जाती है तो भाजपा पूरे महाराष्ट्र में शिवसेना को विलेन साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी. गठबंधन तोड़ने और जनादेश का अपमान करने का आरोप शिवसेना पर ही लगेगा. साथ ही इस बात के भी पूरे आसार हैं कि कांग्रेस और एनसीपी का हाथ पकड़ने पर शिवसेना में अंदरूनी फुट भी पड़ सकती है. आज महारष्ट्र की जो सियासी स्थिति है उसमें अगर शिवसेना कमजोर होती है तो इसका सबसे बड़ा फायदा भारतीय जनता पार्टी को ही होगा.

राष्ट्रपति शासन के कितने आसार

महाराष्ट्र के राजनीतिक इतिहास में केवल दो मौके ही ऐसे आए हैं जब राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा है. पहली बार साल 1980 में फरवरी से जून तक और दूसरी बार साल 2014 में सितम्बर से अक्टूबर तक. अगर शिवसेना भी बहुमत का जरूरी आंकड़ा नहीं जुटा पाई तो राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचेगा. हालांकि राष्ट्रपति शासन लगने पर भी एक तरह से गेंद भाजपा के पाले में ही रहेगी.

अंत में गोरख पांडे की ये कविता और बात खत्म

कुर्सी की महिमा बखानने का यह एक थोथा प्रयास है,
चिपकने वालों से पूछिए, कुर्सी भूगोल है, कुर्सी इतिहास है.

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