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करतारपुर कॉरिडोर के पीछे पाकिस्तान की क्या मंशा है…

ये कॉरिडोर उपहार कम साजिश ज्यादा लगती है..

करतारपुर कॉरिडोर के उद्घाटन के बाद सिखों के संस्थापक और पहले गुरु गुरुनानक देव के जन्म स्थान करतारपुर में अब भारतीय सिख भी अरदास कर सकेंगे. कल तक जिस स्थान को दूरबीन से देख कर ही प्रार्थना करना संभव था और यहां तक कि दर्शन की आस और मन्नत को पूरा करने के लिए ना जाने कितने कानूनी रिवाजों को पूरा करना पड़ता था. लेकिन, अब भारतीयों के विश्वास और आस्था के मद्देनज़र महज़ 4 किलोमीटर की इस दूरी को एक गलियारे में बदल दिया गया. ये कहना गलत नहीं होगा कि दोनों देशों की सरकार और सिख धर्म के लोगों की बहुत सी कोशिशों और श्रद्धा का नतीजा है ये गलियारा..

जाहिर सी बात है इस गलियारे के उद्घाटन के बाद तमाम भारतीय और ख़ास कर के सिख समुदाय के लोग बहुत खुश हैं.क्योंकि अब उन्हें इस 4 किलोमीटर की दूरी को तय करने के लिए एक सरहद नहीं लांघना होगा. मात्र एक तय शुल्क देकर वो उस पावन धरती पर जाकर दर्शन कर सकते हैं. अपनी पूजा-अर्चना, अरदास, मन्नत सब पूरा कर सकते हैं.सरकार का ये कदम सराहनीय तो है और हो भी क्यों नहीं इससे पहले भी इस कॉर्रिडोर के लिए ना जाने कितनी बातें हुई. सरकारें आई-गई लेकिन इसका कोई समाधान नहीं निकल सका. और हर बार ये गलियारा बनते-बनते रह गया.

क्योंकि पाकिस्तान से हमारे रिश्ते कभी उस तरह बन ही नहीं पाए कि पाकिस्तान में बसे तीर्थ धाम करतारपुर जाना इतना आसान हो सके. लेकिन इस गलियारे के उद्घाटन के बाद सारी ऐसी असंभव लगने वाली बातें संभव तो लग  रही हैं. साथ ही पूरे देश को इसकी ख़ुशी है. खास कर के सिख समुदाय के लोगों के लिए तो ये एक सपने के पूरा होने जैसा है.

लेकिन ये सपना जितना सच हुआ है उतना ही सवाल और शक़ भी  खड़े करता है. सवाल, पाकिस्तान की मंशा पर, उनकी नियत पर. पाकिस्तान और भारत के अभी के सम्बन्ध इतने अच्छे है ही नहीं, कि उनपर आंख बंद कर भरोसा किया जा सके. खासकर के तब जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री करतारपुर कॉर्रिडोर के उद्घाटन समारोह के दौरान कश्मीर के मुद्दे का राग अलाप रहे हों.

जिस तरह पाकिस्तान पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता वैसे ही हमारे मन में एक डर भी है कि ना जाने पाकिस्तान अब अपना कौन सा षडयंत्र रचे. इसलिए जरूरत है हमें सचेत रहने की क्योंकि ना जाने इस कोर्रिडोर के पीछे पाकिस्तान की क्या मंशा है. ऐसा हो सकता है कि इस कॉर्रिडोर के जरिए पाकिस्तान कोई मतलब साधना चाहता हो. क्या पता पाकिस्तान के दोस्ती वाले हाथों में आतंकवाद जैसा कोई खंजर हो. क्योंकि कश्मीर में 370 हटने के बावजुद अगर पाकिस्तान अब भी कश्मीर का मुद्दे पर बात करना चाहता है तो क्या पता भारतीयों सिखों को ये उपहार देने के बहाने वो खालिस्तान जैसे मुद्दों की आग ना भड़का दे जिसकी लपटे ना जाने भारत के लोगों के दिलों में कितने वर्षों तक सुलगी थी. इसलिए सचेत रहना होगा और हर कदम फूंक-फूंक के रखने होंगे. फिर क्यों ना नवजोत सिंह सिद्धू जैसे नेता इमरान खान के तारीफ के कितने ही कसीदें पढ़ दे लेकिन है तो वो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ही.. जिस पाकिस्तान ने ना जाने कितनी बार भारत को खून के आंसू रोने पर मजबूर किया है. और पीठ पर वार करना तो उनकी पुरानी आदत है.

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