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अब जरूरत है अयोध्या को धार्मिक पर्यटन की राजधानी बनाने की

भारत में धर्म और अर्थ का सम्बंध सदियों पुराना है. जरूरत है उन्हें एक दूसरे से जोड़ने की

491 साल पुराना विवाद. पीढ़ियों की प्रतीक्षा. दशकों का कानूनी संघर्ष और तमाम अटकलों पर उस समय विराम लग गया जब सर्वोच्च न्यायालय ने 9 नवंबर 2019 को रा म जन्मभूमि विवाद पर अपना निर्णय सुनाया. सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के बाद अयोध्या में राम मंदिर बनने का रास्ता साफ हो गया है.

हालांकि इस निर्णय के बाद भी धर्म, अयोध्या और राम मंदिर से जुड़े कई मुद्दों पर बहस जारी है. इन सब में चर्चा का एक सबसे बड़ा मुद्दा आर्थिक विषय से संबंधित है.

भारत में एक वर्ग ऐसा भी है जिसका मानना है कि वर्तमान समय में धर्म स्थलों का निर्माण करना फिजूलखर्ची है, और इसका देश की आर्थिक प्रगति में कोई योगदान नहीं है. इस वर्ग का कहना है कि मंदिर निर्माण से अयोध्या नगर की दशा दिशा में कोई परिवर्तन नहीं होगा.

लेकिन क्या यह पूर्णतया सत्य है? क्या धर्म स्थलों का आर्थिक गतिविधियों से कोई लेना देना नहीं है?

यहां महाभारत में लिखे एक श्लोक का जिक्र करना उचित होगा.
‘धनाधदि धर्माद स्त्रवति शैलादपि नदी यथा’
अर्थात धर्म ठीक उस तरह धन से निकलता है जैसे कि नदियां पर्वत से.

भारतीय समाज में धार्मिक स्थलों का महत्व केवल उपासना स्थल तक सीमित नहीं रहा है. हिंदू समाज में मंदिर आर्थिक, सामाजिक, शिक्षा और कला के भी प्रमुख केंद्र रहे हैं. आज भी वैष्णो देवी मंदिर, जगन्नाथ मंदिर और काशी विश्वनाथ जैसे मंदिर अपने-अपने शहरों की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं. हजारों लोगों का रोजगार इन धर्म स्थलों पर होने वाली गतिविधियों पर टिका है. भारत में धर्म और उद्यमिता का संबंध सदियों पुराना है. इतिहास गवाह है कि भारत के प्रमुख व्यापार मार्गों और तीर्थ मार्गों के बीच गहरा संबंध है. धर्म और अर्थ का ये संबंध केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, मक्का, यरुशलम, वेटिकन या फिर चीन के प्रमुख बौद्ध तीर्थस्थल भी  सदियों से आर्थिक गतिविधियों के के केंद्र रहे हैं. ऐसे में धर्मस्थलों का अर्थव्यवस्था से संवंध पूरी तरह नकार देना गलत है.

चाहे वह विश्व प्रसिद्ध कुंभ के मेले हों या पुरी की रथयात्रा या फिर अमरनाथ और कैलाश मानसरोवर जैसी दुर्गम तीर्थ यात्राएं. धर्मस्थल हमेशा ही आर्थिक गतिविधियों के केंद्र में होते हैं.

दरअसल अब जरूरत इस बात की है कि शासन सत्ता दूरदर्शिता दिखाए और राम मंदिर के साथ ही अयोध्या के विकास की भी कार्य योजना तैयार करे. अब जब राम जन्मभूमि विवाद का अंत हो गया है और मंदिर बनने का मार्ग प्रशस्त हो गया है तब जरूरत है अयोध्या को धार्मिक पर्यटन का केंद्र बनाने की. न कि व्यर्थ के मुद्दों पर बहस करने की. जरूरत है ऐसी बुनियादी सुविधाओं के विकास की जिससे कि अयोध्या देश विदेश से आसानी से जुड़ सके. त्रेता में राम ने वनवास काटा था और कलियुग में राम की नगरी अयोध्या ने. पिछले 500 सालों में सरयू में काफी पानी बह चुका है. इस बीच सियासत ने अपना खेल खेलना जारी रखा. सरयू के तट पर बसी राम की नगरी चुप चाप ये सारा तमाशा देखती रही. शायद इस उम्मीद में कि एक दिन अंधेरा छटेगा और सूरज निकलेगा. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद पूरे देश से जैसी प्रतिक्रिया आई है उससे ये उम्मीद बंधी है कि अयोध्या के दिन अब बहुरने वाले हैं. अब भी अगर अयोध्या को उसका पुराना गौरव नहीं लौटाया गया तो यह एक ऐतिहासिक नगर के साथ ऐतिहासिक अन्याय होगा.

जब अयोध्या धार्मिक पर्यटन की राजधानी बनेगी. पर्यटन उद्योग विकसित होगा. आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी. लोगों का जीवन स्तर सुधरेगा तभी तो सही मायनों में ‘राम-राज्य’ आएगा.

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